कलयुग में एक राजा था । जिसके *बड़े भाई* के हाथ में किसी जमाने में पूरे *आर्यव्रत की धर्म पताका* हुआ करती थी । और पूरा आर्यव्रत उनका बहुत सम्मान करता था । बड़े भाई की मृत्यु के बाद *आर्यव्रत का समस्त कार्यभार राजा के हिस्से में आ गया।* राजा का स्वभाव भी बहुत अच्छा था । इस वजह से उसने खूब ख्याति अर्जित की। लोगों को राजा के सानिध्य में बड़ी सुरक्षा महसूस होती थी। परंतु वह राजा भी आखिर था तो एक इंसान ही। कोई भगवान तो था नहीं । *उस राजा  में भी एक इंसानी ऐब था । बिल्कुल बाकी सब इंसानों की ही तरह।* वह यह कि वह *अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता था और किसी भी खूबसूरत स्त्री को देख आकर्षित हो जाता था।* 
उसी राज्य की व्यवस्था में न्याय का अधिकार एक *ज्ञान गुरु* को था। जिसे *राज्य द्वारा शक्तियां प्राप्त थी कि वह पूरे राज्य भर में किसी भी विवाद की परिस्थिति में दोनों पक्षों को बिठाकर आमने-सामने फैसला करने का अधिकारी था।* जिसमें राज्य परिषद की उसको सहमति प्राप्त थी। इस शक्ति की वजह से वह चाहे तो *राजा को भी दंड दे सकता था।* उस ज्ञान गुरु के पास यह राजकीय दंड व्यवस्था चलाने हेतु *शिष्यों की टोली थी।* जो कि समय-समय पर गुरु जी को नियम और दंड संहिता की विवेचना करने में मदद किया करती थी। *शिष्यों में एक शिष्य ऐसा था जो कि गुरु जी का बहुत प्रिय था। वह अक्सर उस शिष्य से कहा करते थे कि -  1 दिन तुम मेरी जगह लेकर राज्य की दंड व्यवस्था संभालोगे। और मेरे पद पर आसीन होंगे।* *कुछ वर्षों बाद संयोग से उस गुरु जी  ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और आराम से अपनी कुटिया में जाकर बैठ गए। *फिर गुरुजी के त्यागपत्र देने के बाद राज्य की दंड व्यवस्था भी उनके सबसे प्रिय शिष्य को सौंप दी गयी।* 
इसी कारण लोग गुरु जी के पास आकर अक्सर विवादों में हस्तक्षेप कर समाधान ढूंढने आया करते थे। अब **जब शिष्य ही दंडाधिकारी बन गया और गुरु आम लोगों का सलाहकार**तो कोई भी , जब जब भी किसी आपात दंड परिस्थिति में अथवा विवाद में फँसता *तो वह तुरंत गुरु के पास पहुंचता और शिष्य के दरबार में जाने से पहले ही अपने पक्ष में फैसला करने हेतु मुद्राएं देकर व्यवस्था कर लेता।* 
इन सब बातों से बेखबर राजा की उम्र तकरीबन 60 साल हो चुकी थी । परंतु इस *60 साल की उम्र में भी राजा ने अपना रसिया स्वभाव छोड़ा नहीं था ।* एक दिन अपने एक मित्र की पुत्री पर राजा की नजर पड़ी। तो राजा ने उस *पुत्री समान बालिका को राज सम्मान दिलाने के प्रलोभन देकर अपने राज महल पर बुलाया। जहाँ राजा भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाया और उसने उस पुत्री समान बालिका के साथ रमण करने की तीव्र उत्कंठा के चलते उसे छूने का प्रयास किया।* परंतु वह बालिका समय पर समझदारी करते हुए वहां से *भाग खड़ी हुई* । घर आकर बालिका ने अपने माता पिता से सब कुछ कहा और उसके पिता ने अपने इष्ट मित्रों से सलाह की। बदनामी और राजा के डर से पिता घबरा गया और उसने निर्णय किया की इस बात को यहीं समाप्त कर देना उचित होगा। परंतु *राजा को अपने अंतर्मन का भय ही खाये जा रहा था। उसे लगा कि अब उसकी बहुत ज्यादा बदनामी हो जाएगी , तो  राजा ने दरबार लगाकर लोगों के बीच अपनी पुत्री समान उस बालिका को दुश्चरित्र घोषित करने का प्रयास किया।* जो कि उस बालिका और उसके परिजनों से बर्दाश्त नहीं हुआ। यह जानकर वह बालिका अपने पिता सहित सीधा *राज्य के दंडाधिकारी के पास जाकर राजा के खिलाफ शिकायत करने लगे।* जैसे ही शिकायत दर्ज हुई तो पूरे राज्य भर में कोहराम मच गया। हर कोई राजा के इस कुकृत्य के बारे में बात करने लगा। कुछ लोगों ने तो इस मुद्दे को लेकर राजगद्दी तक से राजा को उतारने की बात कह डाली।  *शिकायत दर्ज होते ही दंडाधिकारी ने राजा को अपने दरबार में  पेशी के लिए बुला भेजा।* जब राजा ने देखा कि पानी सर के ऊपर से जा रहा है , तो राजा *आखेट के बहाने नगर छोड़कर कुछ दिन के लिए बाहर चला गया* , और माहौल शांत होने का इंतजार करने लगा । इसी के दौरान राजा को *गुरु जी यानी कि  पूर्व दंडाधिकारी की याद आई जो कि ऐसे वक़्त में राजा की मदद कर सकता था। क्योंकि वर्तमान दण्डाधिकारी गुरु जी का  शिष्य था। राजा ने तुरंत गुरुजी से संपर्क साधा और उसे सब कुछ बताया। गुरुजी ने कहा कि राजन मुझे वैसे तो यकीन नहीं होता कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है । परंतु फिर भी क्योंकि तुम राजा हो मैं तुम्हारी मदद तभी करूँगा जब तुम मुझे 20 लाख सोने की मुहरें दोगे* ।  राजा ने हाँ भर दी और गुरु जी से  आग्रह किया कि *आपका शिष्य जो वर्तमान में  दंडाधिकारी के पद पर विराजमान है। उसने मुझ पर यह आरोप लगने के बाद अपने दरबार में बुलावा भेजा है। आप कृपया उससे बात कर ले,  कि वह मुझे इस मुसीबत से निकाल दे और फिलहाल मुझे दोष मुक्त कर दे मैं आपकी 20 लाख मुद्राएं आप तक पहुंचा दूंगा । जिस पर पूर्व गुरुजी ने अपने शिष्य को संपर्क में लिया। और उससे राजा की प्राण रक्षा करने की बात कही । नगर दंडाधिकारी तुरंत अपने गुरु की इस बात को मान गया।* परंतु उसने कहा कि मैं इतनी जल्दी राजा को इस मामले में राहत नहीं दे सकता। जनता विद्रोह पर उतर आएगी। *फिर भी बात तय हो गयी की थोड़ी बहुत नाटक नौटंकी करके राजा को इस मुसीबत से निकालना है । बस फिर क्या था ? राजा इतना घृणित कृत्य करके भी इस गुरु चेले की जोड़ी की वजह से उस बालिका के साथ किए हुए दुर्व्यवहार के आरोप से फिलहाल मुक्त हो गया ।* 
 *माँ कसम यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है ।और इसका किसी भी जीवित या मृत आत्मा से कोई लेना देना नहीं है ।* कहानी मात्र यही दर्शाती है , कि *कलयुग में जिसकी चलती है उसकी माफ हर गलती है ।* चाहे वह कितना भी गलत काम कर ले, *यह सड़ा हुआ सिस्टम धन ,पहुंच और प्रलोभन नामक तीन हथियारों से कितनी भी मुखर सच की आवाज को पूरे दम से कुचल देता है। इस घटिया सिस्टम के बल पर चाहे कोई कितना भी जीत कर इठला ले । परंतु ईश्वर के दरबार में यह चालाकी भी घोर पाप है । जिस पाप का दंड राजा को भुगतना ही होगा।* 

 *राजा के गुरु स्वामी आशाराम ने कहा था कि -* 

 *मिलता है करनी का फल ,आज नहीं तो निश्चित कल ...*

जय श्री कृष्ण
"/> कलयुग में एक राजा था । जिसके *बड़े भाई* के हाथ में किसी जमाने में पूरे *आर्यव्रत की धर्म पताका* हुआ करती थी । और पूरा आर्यव्रत उनका बहुत सम्मान करता था । बड़े भाई की मृत्यु के बाद *आर्यव्रत का समस्त कार्यभार राजा के हिस्से में आ गया।* राजा का स्वभाव भी बहुत अच्छा था । इस वजह से उसने खूब ख्याति अर्जित की। लोगों को राजा के सानिध्य में बड़ी सुरक्षा महसूस होती थी। परंतु वह राजा भी आखिर था तो एक इंसान ही। कोई भगवान तो था नहीं । *उस राजा  में भी एक इंसानी ऐब था । बिल्कुल बाकी सब इंसानों की ही तरह।* वह यह कि वह *अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता था और किसी भी खूबसूरत स्त्री को देख आकर्षित हो जाता था।* 
उसी राज्य की व्यवस्था में न्याय का अधिकार एक *ज्ञान गुरु* को था। जिसे *राज्य द्वारा शक्तियां प्राप्त थी कि वह पूरे राज्य भर में किसी भी विवाद की परिस्थिति में दोनों पक्षों को बिठाकर आमने-सामने फैसला करने का अधिकारी था।* जिसमें राज्य परिषद की उसको सहमति प्राप्त थी। इस शक्ति की वजह से वह चाहे तो *राजा को भी दंड दे सकता था।* उस ज्ञान गुरु के पास यह राजकीय दंड व्यवस्था चलाने हेतु *शिष्यों की टोली थी।* जो कि समय-समय पर गुरु जी को नियम और दंड संहिता की विवेचना करने में मदद किया करती थी। *शिष्यों में एक शिष्य ऐसा था जो कि गुरु जी का बहुत प्रिय था। वह अक्सर उस शिष्य से कहा करते थे कि -  1 दिन तुम मेरी जगह लेकर राज्य की दंड व्यवस्था संभालोगे। और मेरे पद पर आसीन होंगे।* *कुछ वर्षों बाद संयोग से उस गुरु जी  ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और आराम से अपनी कुटिया में जाकर बैठ गए। *फिर गुरुजी के त्यागपत्र देने के बाद राज्य की दंड व्यवस्था भी उनके सबसे प्रिय शिष्य को सौंप दी गयी।* 
इसी कारण लोग गुरु जी के पास आकर अक्सर विवादों में हस्तक्षेप कर समाधान ढूंढने आया करते थे। अब **जब शिष्य ही दंडाधिकारी बन गया और गुरु आम लोगों का सलाहकार**तो कोई भी , जब जब भी किसी आपात दंड परिस्थिति में अथवा विवाद में फँसता *तो वह तुरंत गुरु के पास पहुंचता और शिष्य के दरबार में जाने से पहले ही अपने पक्ष में फैसला करने हेतु मुद्राएं देकर व्यवस्था कर लेता।* 
इन सब बातों से बेखबर राजा की उम्र तकरीबन 60 साल हो चुकी थी । परंतु इस *60 साल की उम्र में भी राजा ने अपना रसिया स्वभाव छोड़ा नहीं था ।* एक दिन अपने एक मित्र की पुत्री पर राजा की नजर पड़ी। तो राजा ने उस *पुत्री समान बालिका को राज सम्मान दिलाने के प्रलोभन देकर अपने राज महल पर बुलाया। जहाँ राजा भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाया और उसने उस पुत्री समान बालिका के साथ रमण करने की तीव्र उत्कंठा के चलते उसे छूने का प्रयास किया।* परंतु वह बालिका समय पर समझदारी करते हुए वहां से *भाग खड़ी हुई* । घर आकर बालिका ने अपने माता पिता से सब कुछ कहा और उसके पिता ने अपने इष्ट मित्रों से सलाह की। बदनामी और राजा के डर से पिता घबरा गया और उसने निर्णय किया की इस बात को यहीं समाप्त कर देना उचित होगा। परंतु *राजा को अपने अंतर्मन का भय ही खाये जा रहा था। उसे लगा कि अब उसकी बहुत ज्यादा बदनामी हो जाएगी , तो  राजा ने दरबार लगाकर लोगों के बीच अपनी पुत्री समान उस बालिका को दुश्चरित्र घोषित करने का प्रयास किया।* जो कि उस बालिका और उसके परिजनों से बर्दाश्त नहीं हुआ। यह जानकर वह बालिका अपने पिता सहित सीधा *राज्य के दंडाधिकारी के पास जाकर राजा के खिलाफ शिकायत करने लगे।* जैसे ही शिकायत दर्ज हुई तो पूरे राज्य भर में कोहराम मच गया। हर कोई राजा के इस कुकृत्य के बारे में बात करने लगा। कुछ लोगों ने तो इस मुद्दे को लेकर राजगद्दी तक से राजा को उतारने की बात कह डाली।  *शिकायत दर्ज होते ही दंडाधिकारी ने राजा को अपने दरबार में  पेशी के लिए बुला भेजा।* जब राजा ने देखा कि पानी सर के ऊपर से जा रहा है , तो राजा *आखेट के बहाने नगर छोड़कर कुछ दिन के लिए बाहर चला गया* , और माहौल शांत होने का इंतजार करने लगा । इसी के दौरान राजा को *गुरु जी यानी कि  पूर्व दंडाधिकारी की याद आई जो कि ऐसे वक़्त में राजा की मदद कर सकता था। क्योंकि वर्तमान दण्डाधिकारी गुरु जी का  शिष्य था। राजा ने तुरंत गुरुजी से संपर्क साधा और उसे सब कुछ बताया। गुरुजी ने कहा कि राजन मुझे वैसे तो यकीन नहीं होता कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है । परंतु फिर भी क्योंकि तुम राजा हो मैं तुम्हारी मदद तभी करूँगा जब तुम मुझे 20 लाख सोने की मुहरें दोगे* ।  राजा ने हाँ भर दी और गुरु जी से  आग्रह किया कि *आपका शिष्य जो वर्तमान में  दंडाधिकारी के पद पर विराजमान है। उसने मुझ पर यह आरोप लगने के बाद अपने दरबार में बुलावा भेजा है। आप कृपया उससे बात कर ले,  कि वह मुझे इस मुसीबत से निकाल दे और फिलहाल मुझे दोष मुक्त कर दे मैं आपकी 20 लाख मुद्राएं आप तक पहुंचा दूंगा । जिस पर पूर्व गुरुजी ने अपने शिष्य को संपर्क में लिया। और उससे राजा की प्राण रक्षा करने की बात कही । नगर दंडाधिकारी तुरंत अपने गुरु की इस बात को मान गया।* परंतु उसने कहा कि मैं इतनी जल्दी राजा को इस मामले में राहत नहीं दे सकता। जनता विद्रोह पर उतर आएगी। *फिर भी बात तय हो गयी की थोड़ी बहुत नाटक नौटंकी करके राजा को इस मुसीबत से निकालना है । बस फिर क्या था ? राजा इतना घृणित कृत्य करके भी इस गुरु चेले की जोड़ी की वजह से उस बालिका के साथ किए हुए दुर्व्यवहार के आरोप से फिलहाल मुक्त हो गया ।* 
 *माँ कसम यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है ।और इसका किसी भी जीवित या मृत आत्मा से कोई लेना देना नहीं है ।* कहानी मात्र यही दर्शाती है , कि *कलयुग में जिसकी चलती है उसकी माफ हर गलती है ।* चाहे वह कितना भी गलत काम कर ले, *यह सड़ा हुआ सिस्टम धन ,पहुंच और प्रलोभन नामक तीन हथियारों से कितनी भी मुखर सच की आवाज को पूरे दम से कुचल देता है। इस घटिया सिस्टम के बल पर चाहे कोई कितना भी जीत कर इठला ले । परंतु ईश्वर के दरबार में यह चालाकी भी घोर पाप है । जिस पाप का दंड राजा को भुगतना ही होगा।* 

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madhukarkhin

मिलता है करनी का फल , आज नहीं तो निश्चित कल

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July 11, 2019

कलयुग में एक राजा था । जिसके *बड़े भाई* के हाथ में किसी जमाने में पूरे *आर्यव्रत की धर्म पताका* हुआ करती थी । और पूरा आर्यव्रत उनका बहुत सम्मान करता था । बड़े भाई की मृत्यु के बाद *आर्यव्रत का समस्त कार्यभार राजा के हिस्से में आ गया।* राजा का स्वभाव भी बहुत अच्छा था । इस वजह से उसने खूब ख्याति अर्जित की। लोगों को राजा के सानिध्य में बड़ी सुरक्षा महसूस होती थी। परंतु वह राजा भी आखिर था तो एक इंसान ही। कोई भगवान तो था नहीं । *उस राजा  में भी एक इंसानी ऐब था । बिल्कुल बाकी सब इंसानों की ही तरह।* वह यह कि वह *अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता था और किसी भी खूबसूरत स्त्री को देख आकर्षित हो जाता था।* 
उसी राज्य की व्यवस्था में न्याय का अधिकार एक *ज्ञान गुरु* को था। जिसे *राज्य द्वारा शक्तियां प्राप्त थी कि वह पूरे राज्य भर में किसी भी विवाद की परिस्थिति में दोनों पक्षों को बिठाकर आमने-सामने फैसला करने का अधिकारी था।* जिसमें राज्य परिषद की उसको सहमति प्राप्त थी। इस शक्ति की वजह से वह चाहे तो *राजा को भी दंड दे सकता था।* उस ज्ञान गुरु के पास यह राजकीय दंड व्यवस्था चलाने हेतु *शिष्यों की टोली थी।* जो कि समय-समय पर गुरु जी को नियम और दंड संहिता की विवेचना करने में मदद किया करती थी। *शिष्यों में एक शिष्य ऐसा था जो कि गुरु जी का बहुत प्रिय था। वह अक्सर उस शिष्य से कहा करते थे कि -  1 दिन तुम मेरी जगह लेकर राज्य की दंड व्यवस्था संभालोगे। और मेरे पद पर आसीन होंगे।* *कुछ वर्षों बाद संयोग से उस गुरु जी  ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और आराम से अपनी कुटिया में जाकर बैठ गए। *फिर गुरुजी के त्यागपत्र देने के बाद राज्य की दंड व्यवस्था भी उनके सबसे प्रिय शिष्य को सौंप दी गयी।* 
इसी कारण लोग गुरु जी के पास आकर अक्सर विवादों में हस्तक्षेप कर समाधान ढूंढने आया करते थे। अब **जब शिष्य ही दंडाधिकारी बन गया और गुरु आम लोगों का सलाहकार**तो कोई भी , जब जब भी किसी आपात दंड परिस्थिति में अथवा विवाद में फँसता *तो वह तुरंत गुरु के पास पहुंचता और शिष्य के दरबार में जाने से पहले ही अपने पक्ष में फैसला करने हेतु मुद्राएं देकर व्यवस्था कर लेता।* 
इन सब बातों से बेखबर राजा की उम्र तकरीबन 60 साल हो चुकी थी । परंतु इस *60 साल की उम्र में भी राजा ने अपना रसिया स्वभाव छोड़ा नहीं था ।* एक दिन अपने एक मित्र की पुत्री पर राजा की नजर पड़ी। तो राजा ने उस *पुत्री समान बालिका को राज सम्मान दिलाने के प्रलोभन देकर अपने राज महल पर बुलाया। जहाँ राजा भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाया और उसने उस पुत्री समान बालिका के साथ रमण करने की तीव्र उत्कंठा के चलते उसे छूने का प्रयास किया।* परंतु वह बालिका समय पर समझदारी करते हुए वहां से *भाग खड़ी हुई* । घर आकर बालिका ने अपने माता पिता से सब कुछ कहा और उसके पिता ने अपने इष्ट मित्रों से सलाह की। बदनामी और राजा के डर से पिता घबरा गया और उसने निर्णय किया की इस बात को यहीं समाप्त कर देना उचित होगा। परंतु *राजा को अपने अंतर्मन का भय ही खाये जा रहा था। उसे लगा कि अब उसकी बहुत ज्यादा बदनामी हो जाएगी , तो  राजा ने दरबार लगाकर लोगों के बीच अपनी पुत्री समान उस बालिका को दुश्चरित्र घोषित करने का प्रयास किया।* जो कि उस बालिका और उसके परिजनों से बर्दाश्त नहीं हुआ। यह जानकर वह बालिका अपने पिता सहित सीधा *राज्य के दंडाधिकारी के पास जाकर राजा के खिलाफ शिकायत करने लगे।* जैसे ही शिकायत दर्ज हुई तो पूरे राज्य भर में कोहराम मच गया। हर कोई राजा के इस कुकृत्य के बारे में बात करने लगा। कुछ लोगों ने तो इस मुद्दे को लेकर राजगद्दी तक से राजा को उतारने की बात कह डाली।  *शिकायत दर्ज होते ही दंडाधिकारी ने राजा को अपने दरबार में  पेशी के लिए बुला भेजा।* जब राजा ने देखा कि पानी सर के ऊपर से जा रहा है , तो राजा *आखेट के बहाने नगर छोड़कर कुछ दिन के लिए बाहर चला गया* , और माहौल शांत होने का इंतजार करने लगा । इसी के दौरान राजा को *गुरु जी यानी कि  पूर्व दंडाधिकारी की याद आई जो कि ऐसे वक़्त में राजा की मदद कर सकता था। क्योंकि वर्तमान दण्डाधिकारी गुरु जी का  शिष्य था। राजा ने तुरंत गुरुजी से संपर्क साधा और उसे सब कुछ बताया। गुरुजी ने कहा कि राजन मुझे वैसे तो यकीन नहीं होता कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है । परंतु फिर भी क्योंकि तुम राजा हो मैं तुम्हारी मदद तभी करूँगा जब तुम मुझे 20 लाख सोने की मुहरें दोगे* ।  राजा ने हाँ भर दी और गुरु जी से  आग्रह किया कि *आपका शिष्य जो वर्तमान में  दंडाधिकारी के पद पर विराजमान है। उसने मुझ पर यह आरोप लगने के बाद अपने दरबार में बुलावा भेजा है। आप कृपया उससे बात कर ले,  कि वह मुझे इस मुसीबत से निकाल दे और फिलहाल मुझे दोष मुक्त कर दे मैं आपकी 20 लाख मुद्राएं आप तक पहुंचा दूंगा । जिस पर पूर्व गुरुजी ने अपने शिष्य को संपर्क में लिया। और उससे राजा की प्राण रक्षा करने की बात कही । नगर दंडाधिकारी तुरंत अपने गुरु की इस बात को मान गया।* परंतु उसने कहा कि मैं इतनी जल्दी राजा को इस मामले में राहत नहीं दे सकता। जनता विद्रोह पर उतर आएगी। *फिर भी बात तय हो गयी की थोड़ी बहुत नाटक नौटंकी करके राजा को इस मुसीबत से निकालना है । बस फिर क्या था ? राजा इतना घृणित कृत्य करके भी इस गुरु चेले की जोड़ी की वजह से उस बालिका के साथ किए हुए दुर्व्यवहार के आरोप से फिलहाल मुक्त हो गया ।* 
 *माँ कसम यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है ।और इसका किसी भी जीवित या मृत आत्मा से कोई लेना देना नहीं है ।* कहानी मात्र यही दर्शाती है , कि *कलयुग में जिसकी चलती है उसकी माफ हर गलती है ।* चाहे वह कितना भी गलत काम कर ले, *यह सड़ा हुआ सिस्टम धन ,पहुंच और प्रलोभन नामक तीन हथियारों से कितनी भी मुखर सच की आवाज को पूरे दम से कुचल देता है। इस घटिया सिस्टम के बल पर चाहे कोई कितना भी जीत कर इठला ले । परंतु ईश्वर के दरबार में यह चालाकी भी घोर पाप है । जिस पाप का दंड राजा को भुगतना ही होगा।* 

 *राजा के गुरु स्वामी आशाराम ने कहा था कि -* 

 *मिलता है करनी का फल ,आज नहीं तो निश्चित कल ...*

जय श्री कृष्ण

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