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पैंतीस वर्ष की मेहनत के बाद भाजपा अब कांग्रेस पार्ट टू

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कांग्रेस भौंचक है कि आखिर उसकी यह स्थिती क्योंकर हुई। कुछ उन बड़े कारणों का वर्णन करता हूं जो मैंने अपने आस पास नजदीक से देखे। 18 मई 1975 को इंदिरा गांधी ने वो कदम उठाया जिससे पूरे विश्व में भारत की एक अलग पहचान बनी। वो था भारत का पहला परमाणु विस्फोट। वे भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के अपने एक बड़े मिशन पर चल रही थीं। संभवत: यही कारण रहा कि जब अदालत ने उनके खिलाफ एक कड़ा फैसला सुनाया तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई और इमरजेंसी लागू करने जैसा बड़ा फैसला करना पड़ा। एक बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई कि कांग्रेस आपातकाल लागू करने के अपने फैसले को लेकर हमेशा रक्षात्मक और हीन भावना से ग्रस्त क्यों रही? आठ साल पूर्व आपात काल की बरसी पर मैंने अजमेर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उन प्रमुख लोगों से बातचीत की जो आपातकाल के दौरान जेल भेज दिए गए थे। इनमें महानगर संघ चालक स्वर्गीय भाऊ प्रभुदास, उनके छोटे भाई, सेवक राम सोनी सहित पांच लोग थे। मैंने इनसे सीधे यह नहीं पूछा कि आपातकाल ठीक था या नहीं, बल्कि यहां से शुरुआत की कि देश में अनुशासनहीनता की स्थिति है, भ्रष्टाचार है, उद्दंडता है, इनसे आखिर कैसे निपटा जाए। लगभग सभी ने यह कहा कि देश में कड़े कानूनों की सख्त जरूरत है। यहीं पर मेरा सवाल था कि आपातकाल के दौरान सरकारी काम काज की स्थिति कैसी थी? सभी ने कहा-बहुत अच्छी थी, कोई गलती नहीं कर सकता था। लोग समय से पहले अपनी ड्यूटी पर पहुंचते थे और देरी से दफ्तर छोड़ते थे। कोई कारोबारी तय राशि से ज्यादा राशि ले नहीं सकता था, लेने वाले मीसा में बंद कर दिए जाते थे। इस साक्षात्कार का सार यह था कि यदि राजनीतिक दुश्मनी से संघ, जनसंघ और अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल भेजने का धतकर्म कांग्रेस नहीं करती तो आपातकाल सुशासन का प्रतीक बन जाता। यह साक्षात्कार दैनिक भास्कर में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। तब डॉ. इंदुशेखर पंचौली अजमेर संस्करण के संपादक थे। आपातकाल के दौरान अखबार वही छापते थे जो सरकार चाहती थी। अब अखबार विज्ञापन भी वो ही छापते जिनसे अच्छी रेवेन्यू मिले चाहे वो लिंग वर्धक उपकरणों के फर्जी और हमारे घरों में माताओं-बहनों और हमें शर्म से नजरें झुकाने के लिए मजबूर कर देने वाले विज्ञापन ही क्यों न हों। मै मूल मुद्दे पर आता हूं। आपातकाल के बाद कांग्रेस ऐतिहासिक हार से गुजरी। जनता पार्टी सत्ता में आई। ढाई साल में हार गई और कांग्रेस की जबर्दस्त वापसी हुई। यहीं से भाजपा का जन्म हुआ। साथ मैं पैदा हुई एक नई सोच-कांग्रेस पार्ट टू बनने की। उस दौर में मीडिया पर कांग्रेसी और कम्यूनिस्ट विचारधारा के पत्रकारों का एकाधिकार था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा ने सबसे पहले इसी तिलिस्म को तोड़ने की तैयारी की। देखिए किस तरह से किया 1. अजमेर के संदर्भ में मैं बता दूं कि 1980 से 1990 के बीच बड़ी संख्या में ऐसे युवा पत्रकारों को मीडिया में नियोजित तरीके से उतारा गया जो संघनिष्ठ थे या भाजपा के कार्यकर्ता। ऐसा देशभर में किया गया। कुछ ही वर्षों में मीडिया में संघनिष्ठ पत्रकारों की एक बड़ी खेप प्रभावी भूमिका में आ गई। कांग्रेसी सोते रहे। मुगालते में रहे कि इससे क्या फर्क पड़ता है। 2. लोगों को जोड़ने के लिए कवि सम्मेलनों के आयोजन किए गए। बड़े पैमाने पर। आयोजन भी संघ और भाजपा से जुड़े लोगों के हाथों में रखा। इनमें कवि भी वे ही बुलाए जाते थे जो कट्‌टर संघनिष्ठ थे, या आपातकाल में जेल गए। ये कवि सम्मेलन कम और कांग्रेस की जड़ों में मट्‌ठा डालने के आयोजन ज्यादा साबित हुए। पुराने लोगों को भाजपा के शहर अध्यक्ष रहे एडवोकेट पूर्णाशंकर दशोरा की वो गंभीर और भारी आवाज जरूर याद होगी। 3. सबसे बड़ा और कांग्रेस को जड़ों से उखाड़ फैंकने वाला काम संघ और भाजपा ने यह किया कि उसने दलितों को जातियों में बांट दिया। मेरे इस कथन से कई लोग असहमत हो सकते हैं, लेकिन सच यही है। अजमेर के संदर्भ में ही बात करें। 80 से 90 तक के दौर तक अजमेर में दलित यानि एससी एसटी में कोई भेद नहीं कर पाता था। इस वर्ग की किसी भी जाति में किसी पर कोई अत्याचार होता था तो इस वर्ग की तमाम जातियां इसे खुद पर हुआ अत्याचार मानती थीं। इनकी एकजुटता कांग्रेस की बड़ी ताकत थी। इसी को तोड़ा गया। एक मिशन चलाया गया, दूरगामी सोच के साथ कि कोली जाति का ही विधायक या मंत्री क्यों बने? रैगर, बैरवा, वाल्मीकि या खटीक जाति का क्यों नहीं बने? कांटे से कांटा निकालने की रणनीति का नतीजा रहा कि श्रीकिशन सोनगरा, ओम प्रकाश जटिया, चरणदास चांवरिया जैसे दलित नेताओं का भाजपा में प्रादुर्भाव हुआ। बाद में वीरेंद्र खटूमरा, अनिता भदेल, डॉ. प्रियशील हाड़ा भी उभरे। कांग्रेसी खर्राटे ही भरते रहे। आयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर मुद्दे को लेकर भाजपा जब राष्ट्रीय स्तर पर रथयात्रा की तैयारी कर रही थी उस दौरान विहिप नेता अशोक सिंघल अजमेर आए थे। एक दर्जन से ज्यादा ब्लैक कैट कमांडो से घिरे सिंघल ने कृष्णगंज स्थित विहिप कार्यालय में प्रेस कांफ्रेंस की थी। उन्होंने कहा कि अब दलित वर्ग में भी विहिप काम करेगी। मेरा चुभता सवाल यह था-इतने बरसों बाद दलितों की याद कैसे आ गई? अशोक सिंघल का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा था। कांफ्रेंस के बाद वरिष्ठ पत्रकार गिरधर तेजवानीजी ने मुझे कहा-उनका गुस्सा देखा, आप पत्रकार न होते थे उठाकर बाहर फिंकवा देते। सार यह कि इन 35 वर्षों में भाजपा और संघ ने यह सीख लिया कि हर वो कदम जायज है जिससे कुर्सी मिले। इसीलिए तो कांग्रेसियों के नाम से ही नफरत करने वाली भाजपा कांग्रेसियों को तोड़ने, पार्टी में शामिल करने,चुनाव जीतने और मुख्यमंत्री बनाने तक से परहेज नहीं कर रही। जिन नरसिम्हाराव पर हॉर्स ट्रेडिंग के जरिए बहुमत हासिल करने का आरोप लगाया गया उन्हीं के नक्शे कदम पर चल कर गोवा और मणिपुर में सरकार बनाने में रत्ती भर भी संकोच नहीं किया। भाजपा आज हर वो कदम उठा रही है जो सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस उठाया करती थी। यानि अब देश में भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पार्ट टू बन गई है। यदि आप मेरी बात से असहमत हैं तो दो चीजों का जवाब प्रेक्टीकल कर तलाशिए- 1. क्या नगर निगम में बिना लिए दिए काम हो रहा है? 2. क्या एडीए में कोई भी काम बिना रिश्वत के आसानी से हो रहा है? पुलिस के काम काज को भी जांच लीजिएगा। यदि आपका जवाब हां में अपनी बात बिना किसी झिझक के अपनी राय तुरंत वापस ले लूंगा। ----------- प्रताप सिंह संकत (वरिष्ट पत्रकार)---------

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