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एक्सपर्ट्स बोले, बच्चों के लिए खतरनाक हैं इतने ज्यादा नंबर, इस अंधी होड़ में न भागें

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नेशनल डेस्क। मंगलवार को CBSE के 10वीं बोर्ड के नतीजे आए। इनमें 1,31,493 स्टूडेंट्स को 90% से ज्यादा तो 27,476 स्टूडेंट्स को 95% से ज्यादा मार्क्स आए हैं। वहीं, रिजल्ट के तुरंत बाद उम्मीद से कम नंबर आने पर तीन बच्चों ने सुसाइड कर लिया।

आखिर सीबीएसई की एग्जाम में स्टूडेंट्स को इतने नंबर क्यों मिल रहे हैं? और नंबरों की इस अंधी दौड़ ने क्या बच्चों और पैरेंट्स पर एक्स्ट्रा प्रेशर नहीं डाल दिया? नंबरों की इस मार-काट वाली प्रतिस्पर्धा ने हमारे पूरे एजुकेशन सिस्टम पर ही सवाल खड़े कर दिए है। इस सवाल को लेकर DainikBhaskar.com ने बात की सीबीएसई के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली, एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर व शिक्षाविद् जेएस राजपूत, सीबीएसई में काउंसलर एंड साइकोलॉजिस्ट डॉ. शिखा रस्तोगीऔर शिक्षा क्षेत्र से जुड़े अन्य जानकार लोगों और टीचर्स से।

नंबर्स की बाढ़ से बढ़ेंगी ये 3 प्रॉब्लम :


1.अनावश्यक प्रेशर बढ़ेगा :सीबीएसई के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुलीकहते हैं कि नंबरों की यह दौड़ चिंताजनक है। बच्चों पर प्रीमियम परफॉर्मेंस के लिए जोर दिया जा रहा है। इससे न केवल बच्चों और पैरेंट्स पर प्रेशर बढ़ेगा, बल्कि जिन बच्चों के ज्यादा नंबर नहीं आएंगे या 70-75 फीसदी मार्क्स लाने वाले बच्चे अपने फ्यूचर को लेकर दुविधा में आ जाएंगे।

2.बढ़ेगा फ्रस्टेशन : एनसीईआरटी के पूर्व डायरेक्टर और शिक्षाविद्जेएस राजपूत एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि रिजल्ट डिक्लेयर होते ही एक बच्चा उनके पास आया। उसके 95 फीसदी मार्क्स थे। वह बहुत खुश था। लेकिन जब वह स्कूल गया तो वहां स्कूल मैनेजमेंट ने एक लिस्ट लगा रखी थी जिसमें उसका 47वां नंबर था। वह यह देखकर वह फ्रस्टेट हो गया। वे कहते हैं कि कम नंबर्स लाने वाले बच्चे तो फ्रस्टेट होंगे ही, जिन बच्चों के अधिक नंबर आए हैं, उन्हें भी भविष्य में दिक्कत हो सकती है। अब उनसे हमेशा बेहतर परफॉर्म करने की उम्मीद रहेगी। अगर वे फ्यूचर में अच्छा परफॉर्म नहीं करते हैं तो उनमें और ज्यादा फ्रस्टेशन आएगा। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसे बच्चे ज्यादा परेशान होंगे।

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