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कांग्रेस में अगर विरोध या संघर्ष के बीज पनपे होते तो आज राहुल गांधी की जगह राष्ट्रीय अध्यक्ष कोई और होता।

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कांग्रेस में अगर विरोध या संघर्ष के बीज पनपे होते तो आज राहुल गांधी की जगह राष्ट्रीय अध्यक्ष कोई और होता।


राहुल गांधी के अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस की एक नयी शुरुआत , युवा शुरुआत हो गई है। इसके संकेत राहुल गांधी ने 84 वें अधिवेशन में अपने भाषण में दे दी थी। राहुल ने जब युवाओं के लिये खाली स्थान को भरने की बात की तो बहुत देर तक तालियां बजीं , मतलब साफ कि सबको उनकी बात पसन्द आई और कार्यकर्त्ताओं में युवा बाहुल्य था। बुजुर्गों का कार्यक्षेत्र बदला जा सकता है। उन्हें कुछ और ज़िम्मेदारी दी जा सकती है।ऐसा ही बहुत कुछ बीजेपी में यशवन्त सिन्हा , मुरली मनोहर जोशी और लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हुआ है।


अब अगर राजस्थान की ज़िम्मेदारी सचिन पायलट को सौंप दी गई है तो उनके कार्यक्रमों में अशोक गहलोत या सीपी जोशी का क्या काम ?

पर इसमें एक वरिष्ठ पत्रकार को "संघर्ष" की बू नज़र आ रही है।

अशोक गहलोत को केन्द्र या गुजरात या किसी महत्वपूर्ण स्थान पर खपाया जा सकता है।

राहुल और सोनिया के नेतृत्व का सम्मान ही है कि गुजरात में गहलोत ने काम किया तो वहां पायलट नहीं थे और राजस्थान में पायलट ने काम किया तो अशोक गहलोत नहीं थे।

कांग्रेस में संघर्ष या विरोध  इन वरिष्ठ पत्रकार की दिमागी उपज भर है।ऐसा कुछ भी नहीं होनेवाला।

पत्रकार महोदय यहीं पर नहीं रुके उन्होंने राहुल गांधी को गलत साबित करते हुए उन्हें राजनीति का पाठ भी पढ़ा दिया कि राजनीति में जो बोला जाता है वह किया नहीं जाता और जो किया जाता है वह बताया नहीं जाता।

प्रभु करें इन्हें राहुल गांधी अपना सलाहकार बना लें।

मुझे तो सचिन पायलट के अजमेर दरगाह में चादर चढ़ाने के प्रोग्राम में गहलोत और जोशी के न होने में कांग्रेस की एकता और राहुल गांधी के फैसले का सम्मान ही नज़र आता है।

हो सकता है मेरी सोच सकारात्मक है और इन भाई साहब की नकारात्मक।

कांग्रेस में अगर विरोध या संघर्ष  के बीज पनपे होते तो आज राहुल गांधी की जगह राष्ट्रीय अध्यक्ष कोई और होता।

अन्त में मेरा मानना है राहुल गांधी युवा और अनुभवियों के बीच सामंजस्य बिठाकर सबको उपयुक्त स्थान सौंपेंगे।

जयहिन्द।

राजेन्द्र सिंह हीरा

       अजमेर

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