मुमकिन है कि उनके सुकृत्यों से  गहलोत जी को अलग किस्म की खुशबू आने लगी हो ।कुछ तो हुआ ही होगा वरना गहलोत भैया नाहक  क्यों अपने मजबूत पहलवान को नाराज होने देते ।आम दिनों में कई सालों तक अजमेर की ओर पीठ करके खड़े हुए रघु शर्मा अब  फिर मैदान में हैं  ।जैसे सचिन पायलट साइकिल पर सवारी करने अजमेर आ गये थे ।अब वे कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार नहीं होना चाहते। जानते हैं कि ये  अजमेरिये कुछ भी कर सकते हैं ।

वह गद्दी और गधी में अंतर समझते हैं। इसलिए रघु शर्मा उन्हें कद्दावर गुब्बारा नजर आए ।बुलाकर फुस्स हुए गुब्बारे में हवा भरी। तनाव आ गया। साला  मैं तो साहब बन गया ,साहब बन के कैसा तन गया। 

प्रदर्शनकारी के रूप में उन्होंने अवतार लिया । उनके चिलगोजे जबरदस्त मोर्चाबंदी करने लगे।व्यवसायी संगठित हो गए । शर्मा जी पहलवान हो गए।जे पी साहब ने फिर सूती शर्ट की बाजू चढ़ा ली।ब्राह्मणवाद की शहनाई बजने लगी।और लो फिर एक नेता मैदान में आ गया।

 जमूरे आजा ।आ गया।तू कौन?जमूरा। मैं कौन ?मदारी .डमरु बजने लगा है।लेकिन वक्त डमरू की खाल बजा कर कब फाड़ेगा यह जमूरा नहीं जानता ।यदि हार  का जरा भी डर नहीं होता तो खुद पायलट क्यों नहीं चुनाव लड़ते। फटी हुई----------( एड़ी) में वैसलीन क्यों लगाई जाती ।हम तो बात कर रहे हैं नतीजा पब्लिक के हाथ में है।

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रघु की नीति: सुरेंद्र चतुर्वेदी

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October 26, 2017

रघु की नीति: सुरेंद्र चतुर्वेदी


 रघु की रीति यही चल आयी, वोटन के दिन शक्ल दिखाई। नेताजी रघु शर्मा अचानक अजमेर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन करते हुए नजर आए तो अजमेरियों का दिमाग बिजली के मीटर जैसा चलने लगा। चुनाव हारने के बाद जो गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गया था वह नेता अचानक हिरनाकश्यप की तरह खंबे से बाहर आ गया। जिले की समस्या अचानक इतनी बड़ी कैसे हो गई कि  नेता जी को नज़र आने लगीं।केकड़ी अचानक फिर से याद आने लगा। उनके हाथ पांव हिलने लगे। अंग-प्रत्यंगों में करंट आ गया ।

कुछ अजमेरिये  मेरे पास आकर बोले "रघु शर्मा क्या चुनाव लड़ेंगे" अपुन मुस्कुराए और बोले. रघु शर्मा कांग्रेसी अखाड़े का पुराना पहलवान है। राजस्थान केसरी रह चुका है ।बाहुबली है ।अशोक गहलोत के जमाने में उसकी ताकत का कोई अंदाजा नहीं लगा पाता था ।सही मायने में वह मिनी चीफ मिनिस्टर हुआ करता था। तबादलों की राजनीति में माहिर। कोई सा भी मंत्रालय हो फाइल पर अगर रघु शर्मा का आशीर्वाद पैदा करवा दिया जाता था तो काम बिना बाधा हो जाता था। खास तौर से प्रशासनिक अधिकारियों के ट्रांसफर और बाद में उन के जरिए बड़े से बड़े काम करवाने में उनका कोई सानी नहीं था ।पता नहीं किस चक्कर में उनकी अशोक गहलोत जी से अनबन हो गई ।

मुमकिन है कि उनके सुकृत्यों से  गहलोत जी को अलग किस्म की खुशबू आने लगी हो ।कुछ तो हुआ ही होगा वरना गहलोत भैया नाहक  क्यों अपने मजबूत पहलवान को नाराज होने देते ।आम दिनों में कई सालों तक अजमेर की ओर पीठ करके खड़े हुए रघु शर्मा अब  फिर मैदान में हैं  ।जैसे सचिन पायलट साइकिल पर सवारी करने अजमेर आ गये थे ।अब वे कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार नहीं होना चाहते। जानते हैं कि ये  अजमेरिये कुछ भी कर सकते हैं ।

वह गद्दी और गधी में अंतर समझते हैं। इसलिए रघु शर्मा उन्हें कद्दावर गुब्बारा नजर आए ।बुलाकर फुस्स हुए गुब्बारे में हवा भरी। तनाव आ गया। साला  मैं तो साहब बन गया ,साहब बन के कैसा तन गया। 

प्रदर्शनकारी के रूप में उन्होंने अवतार लिया । उनके चिलगोजे जबरदस्त मोर्चाबंदी करने लगे।व्यवसायी संगठित हो गए । शर्मा जी पहलवान हो गए।जे पी साहब ने फिर सूती शर्ट की बाजू चढ़ा ली।ब्राह्मणवाद की शहनाई बजने लगी।और लो फिर एक नेता मैदान में आ गया।

 जमूरे आजा ।आ गया।तू कौन?जमूरा। मैं कौन ?मदारी .डमरु बजने लगा है।लेकिन वक्त डमरू की खाल बजा कर कब फाड़ेगा यह जमूरा नहीं जानता ।यदि हार  का जरा भी डर नहीं होता तो खुद पायलट क्यों नहीं चुनाव लड़ते। फटी हुई----------( एड़ी) में वैसलीन क्यों लगाई जाती ।हम तो बात कर रहे हैं नतीजा पब्लिक के हाथ में है।

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