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August 22, 2017

तब तलक़ उसके दर पे जलता हूँ, जब तलक़ वो बुझा नहीं देता

दर्द को आसरा नहीं देता, ज़ख्म लेकिन नया नहीं देता. जो वफ़ा मांग के तो ले जाता, मुझको वापस वफ़ा नहीं देता. डाल दी क़ायनात क़दमों में, फिर भी वो तो दुआ नहीं देता. तोड़ डाला हवाओं ने उसको, जो शजर अब हवा नहीं देता. मैं गुनाहों से दूर हूँ शायद , अब कोई भी सज़ा नहीं देता. जो मेरे घर पे रोज़ आता है, अपने घर का पता नहीं देता. दर्द अब दर्द भी नहीं देते, अब मज़ा भी मज़ा नहीं देता तब तलक़ उसके दर पे जलता हूँ, जब तलक़ वो बुझा नहीं देता.          सुरेन्द्र चतुर्वेदी

May 9, 2017

क़िस्सा ए ग़म सुनाऊँ क्या - सूफी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

क़िस्सा ए ग़म सुनाऊँ क्या, लौट के वापस आऊं क्या. हाथ कटा कर हाज़िर हूँ, सर भी अब कटवाऊं क्या.

April 30, 2017

एक ऐसा जहां प्रधानमंत्री चराते हैं बकरी और राष्ट्रपति देते हैं खेतों में पानी

सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लगेगा, लेकिन यह वाकया बिलकुल सच है. आपने शायद ही कभी ऐसा सुना होगी कि प्रधानमंत्री बकरी चराने गए हैं और राष्ट्रपति खेतों में पानी दे रहे हैं. लेकिन आज हम जिस गांव की बात करने जा रहे हैं, वहां ऐसा ही कुछ होता है. बता दें, राजस्थान के बूंदी जिले में पड़ने वाले इस रामनगर गांव में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के अलावा यहां राज्यपाल कंचे खेलते हैं तो एक टूटी बंदूक के लिए कलेक्टर आपस में भिड़े रहते हैं. लेकिन ये सब यहां क्यों और कैसे होता है, यह जानने के बाद आप एक बार हैरत में जरूर पड़ जाएंगे.

April 5, 2017

घर पर ख़ुशी को आए कई रोज़ हो गए

घर पर ख़ुशी को आए,कई रोज़ हो गए , उनसे नज़र मिलाए , कई रोज़ हो गए चेहरा पढ़ा जो माँ का,महसूस हो गया , बच्चों को मुस्कराए , कई रोज़ हो गए . महफ़िल में दोस्तों की ,चलो दिल ने ये कहा , अपनों से चोट खाए ,कई रोज़ हो गए . तू गर है माहताब तो बहार ज़रा निकल , बदली में मुँह छुपाए, कई रोज़ हो गए. ये मयक़दे से सोच कर ,बाहर निकल गये, बिन पीये लडखड़ाए, कई रोज़ हो गए. तूफाँ को कह दिया है, के आए हमारे घर, ताक़त को आज़माए ,कई रोज़ हो गए

March 15, 2017

जिसके पास एहसासों की दोलत हो,वो अल्फाजो की गुलामी नही करता-सूफी सम्राट सुरेन्द्र चतुर्वेदी

अजमेर/अंदाज़े बयाँ .देखिये सूफी सम्राट सुरेन्द्र चतुर्वेदी के कुछ सूफी पल.

January 3, 2017

बुरे वक्त का लम्हा हूँ, अंधा,गूंगा बहरा हूँ.

बुरे वक्त का लम्हा हूँ, अंधा,गूंगा बहरा हूँ. अहसासों के काग़ज़ पर, ख़ुद को लिखता रहता हूँ. गिरने को हूँ यूँ समझो, एक पुराना कमरा हूँ.

February 4, 2017

मैं अपने आप से रूठा हुआ था,

मैं अपने आप से रूठा हुआ था, तभी तो इस क़दर तन्हा हुआ था. अगर आसान था घर छोड़ देना, किसी ने क्यूँ मुझे रोका हुआ था.

March 1, 2017

घर पर ख़ुशी को आए,कई रोज़ हो गए ,

घर पर ख़ुशी को आए,कई रोज़ हो गए , उनसे नज़र मिलाए , कई रोज़ हो गए.. चेहरा पढ़ा जो माँ का,महसूस हो गया , बच्चों को मुस्कराए , कई रोज़ हो गए .



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